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अमेरिका नहीं चाहता कि कोई भी देश उससे ज्यादा शक्तिशाली हो

रजा ग्राफी न्यूज:- दुनिया में रुस ही एक ऐसा मुल्क है, जो अमेरिका की ताकत को टक्कर देता है, जिसकी ताकत को अमेरिका अपने लिए खतरा मानता है. रूस के बाद दूसरा ऐसा मुल्क चीन है, जो एक उभरती हुई ताकत है. यह भी अमेरिका को टक्कर दे सकता है, लेकिन यहां पर रूस की बात ही कुछ अलग है. क्योंकि रूस की परमाणु ताकत के सामने दुनिया का कोई भी मुल्क नहीं टिकता, यहाँ तक की अमेरिका के पास भी इसका कोई तोड़ नहीं है.

हाँ अमेरिका कोशिश जरुर कर रहा है कि वो अपने ऊपर होने वाले किसी भी परमाणु हमले को रोकने में सक्षम हो जाए, लेकिन फ़िलहाल ऐसा कर पाना संभव नहीं है. रूस भी पूर्व में किए गए परमाणु समझौते को तोड़ चुका है और यूक्रेन की जंग की वजह से अपनी ताकत को लगातार बढ़ा रहा है. जिसमें अमेरिका के दुश्मन देश ईरान और चीन भी उसका साथ दे रहे हैं.

अमेरिका की विभाजनकारी नीति

रूस की ऐसी बढ़ती हुई ताकत को देखकर अमेरिका को एक बार फिर से अपने वर्चस्व की चिंता होने लगी है. इसीलिए अमेरिका रूस की ताकत को कम करने की कोशिश में जुटा हुआ है. वर्षों पहले भी अमेरिका सोवियत संघ की ताकत को देखकर चिंतित और दुखी था. उस समय अमेरिका अपनी विभाजनकारी निति के तहत सोवियत संघ को कई भागो में तोड़ने में कामयाब रहा. क्योंकि उस समय सोवियत संघ काफी शक्तिशाली था और बड़ी ही तेजी के साथ तरक्की कर रहा था, आगे बढ़ रहा था.

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यह बात अमेरिका को बिल्कुल भी रास ना आई और उसने सोवियत संघ को तोड़ने की ठान ली और अमेरिका अपनी विभाजनकारी निति में कामयाब हुआ. उसके बाद एक-दूसरे की जरूरतों को देखते हुए रसिया और अमेरिका के रिश्ते धीरे-धीरे सुधरे, फिर काफी लंबे समय तक ठीक चले, लेकिन जैसे ही रसिया उभरने लगा यानी अमेरिका का रुस के सामने वर्चस्व कम होने लगा, तो अमेरिका ने अपनी विभाजनकारी नीति के तहत रूस को फिर से तोड़ने की कोशिश शुरू कर दी.

जिसके चलते दूसरी बार अमेरिका ने रूस को कमजोर करने के लिए उसके पड़ोसियों को रूस के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया, रूस के पड़ोसियों को कई ऑफर दी, ताकि वह रूस के साथ जंग करें और रूस कमजोर हो. इसके लिए अमेरिका ने रूस का उसके पड़ोसियों को खौफ दिखाते हुए रूस के खिलाफ नाटो संगठन बनाया और जिसमें अब तक 30 देश शामिल हो चुके हैं. इन देशों को अमेरिका ने भड़काते हुए, रूस का डर दिखाते हुए नाटो में शामिल किया और रूस से पूर्ण सुरक्षा की गारंटी दी.

सोवियत के टूटने के बाद ही रूस को अमेरिका की विभाजनकारी नीति को समझ जाना चाहिए था और उसी हिसाब से रूस को अमेरिका के खिलाफ काम करना चाहिए था, लेकिन इसमें कहीं ना कहीं रूस से चूक हुई, रूस ढीला पड़ा, जिसका खामियाजा उसको आज भी नाटो के रूप में भुगतना पड रहा है. नाटो संगठन बनाकर अमेरिका ने रूस को चारो तरफ से घेर रखा है. वर्तमान समय में चल रही रूस-यूक्रेन की जंग अमेरिका की विभाजनकारी नीति का ही एक हिस्सा है. यह अमेरिका की रूस को तोड़ने वाली सोची समझी साजिश है. इसके पीछे अमेरिका का मकसद ही कुछ और है.

अमेरिका ने यूक्रेन को बार-बार भड़काया जिसके बहकावे में आकर यूक्रेन ने अपने पड़ोसी मुल्क रुस की बात को नहीं माना और नाटो में शामिल होने की जिद पर अड़ा रहा. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की को कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन अमेरिका के बहकावे की वजह से यूक्रेन अमेरिका के जाल में फंसता चला गया और उसी का परिणाम आज यूक्रेन भुगत रहा है. कुछ हद तक अमेरिका को भी इससे काफी नुकसान हो रहा है, लेकिन अमेरिका यह सब अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए कर रहा है.

अब रूस ने अपने पुराने इतिहास को देखते हुए अमेरिका को कमजोर करने की ठान ली है. इसमें अमेरिका के दुश्मन देश चीन और ईरान भी उसका साथ दे रहे हैं, क्योंकि यह देश भी अमेरिका को अपना दुश्मन मानते हैं. ईरान और चीन भी अपनी ताकत को लेकर दुनिया की नजरों में उभर रहे हैं, जो अमेरिका के दिल में चुभ रहे हैं. इसीलिए अमेरिका समय-समय पर इन देशों पर बेवजह प्रतिबन्ध लगाता रहता है, अपने फायदे के लिए. जिससे कि इन देशों की आर्थिक स्थिति कमजोर हो और यह देश तरक्की ना कर पाए, लेकिन अब इन देशों ने भी अमेरिका को कमजोर करने की ठान ली है. जिसका अब अमेरिका पर गहरा असर पड़ रहा है.

रूस और ईरान के बीच डील

ताजा जानकारी के अनुसार आपको बता दें कि रूस और ईरान के बीच डील हुई है कि वह दोनों अमेरिका को कमजोर करने के लिए डॉलर को छोड़कर अपनी राष्ट्रीय मुद्रा को एक-दूसरे के साथ व्यापार करने में इस्तेमाल करेंगे.

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ईरान और रूस ही नहीं बल्कि चीन और अन्य देश भी अमेरिकी डॉलर से लेनदेन कम करने की कोशिश कर रहे हैं. वह अपने व्यापार को एक-दूसरे की राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं. बता दे कि भारत को भी रुस से सस्ते दामों में कच्चा तेल खरीदने के लिए चीन की करेंसी का इस्तेमाल करना पड़ा.

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